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भारत, चीन, रूस... क्या ट्रंप के टैरिफ को टक्कर दे पाएगी यह तिकड़ी? जानें अमेरिका के मुकाबले कितने मजबूत हैं ये तीनों देश

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नई दिल्ली: चीन के तियानजिन शहर में आज यानी रविवार से दो दिवसीय शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन शुरू हो गया। इसमें चीन, भारत और रूस के साथ 20 देशों के नेता जुड़ेंगे। आज यानी संडे को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की। चीनी राष्ट्रपति ने बैठक के दौरान अपने संबोधन में कहा कि भारत और चीन के लिए सही विकल्प यह है कि दोनों दोस्त और साझेदार बनें। वहीं रूस राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी चीन पहुंच गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ के बाद से तीनों देश (भारत, रूस और चीन) एक दूसरे के काफी करीब आ रहे हैं।



अब बात आती है कि क्या ये तीनों देश मिलकर अमेरिका के टैरिफ का तोड़ निकाल सकते हैं। चीन में एससीओ शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब ट्रंप ने भारतीय सामानों पर 50% टैरिफ लगाया है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रंप के टैरिफ विवाद के बीच यह शिखर सम्मेलन निवेशकों के लिए अच्छी खबर है।



भारत के लिए कैसे फायदेमंद यह सम्मेलन?यह शिखर सम्मेलन भारत, चीन, रूस और अन्य भाग लेने वाले देशों को एक साथ लाता है। यह अमेरिका के टैरिफ के खिलाफ एकजुटता और सामूहिक शक्ति दिखाता है, जिसे पूरे एशिया में अनुचित माना जाता है।



मिंट की एक खबर के मुताबिक फिनोक्रेट टेक्नोलॉजीज के संस्थापक और निदेशक गौरव गोयल ने कहा कि भारत के लिए, यह अमेरिका से मिलने वाली रियायतों पर निर्भर रहने से दूर क्षेत्रीय समाधानों की खोज की ओर बदलाव को दर्शाता है। भारत अब अमेरिका पर निर्भर नहीं रहना चाहता, बल्कि अपने आसपास के देशों के साथ मिलकर काम करना चाहता है।



गोयल ने आगे कहा कि चीन और रूस दोनों अब अपनी अर्थव्यवस्थाओं को भारत के लिए और खोल रहे हैं, जिससे व्यापार को बढ़ाने और अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव को कम करने में मदद मिल रही है। भारत चीन के साथ अपने रिश्ते सुधार रहा है ताकि व्यापार में फायदा हो सके। यह शिखर सम्मेलन ऊर्जा, बुनियादी ढांचे और भुगतान जैसे क्षेत्रों में भी व्यापक सहयोग को बढ़ावा देता है। भारत दूसरे देशों के साथ मिलकर ऊर्जा और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में भी काम कर रहा है।



तीनों देशों की जीडीपी क्या?टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक भारत, चीन और रूस एक साथ मिलकर जीडीपी (PPP) में 53.9 ट्रिलियन डॉलर का योगदान करते हैं, जो दुनिया के कुल उत्पादन का लगभग एक तिहाई है। उनका निर्यात 5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है। उनके पास 4.7 ट्रिलियन डॉलर का विदेशी भंडार है, जो वैश्विक कुल का 38% है। उनकी संयुक्त आबादी 3.1 अरब है, जो कुल आबादी का लगभग 38% है।



तीनों देशों का संयुक्त सैन्य खर्च 549 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो दुनिया के रक्षा बजट का पांचवां हिस्सा है। वे वैश्विक ऊर्जा का 35% उपभोग करते हैं। प्रत्येक देश की अपनी अलग-अलग मजबूती है। चीन की मजबूती मैन्युफैक्चरिंग में है तो रूस की एनर्जी में और भारत की डायनामिक सर्विस इकोनॉमी।



अगर ये तीनों देश एक हो जाते हैं तो पश्चिम के प्रभुत्व वाली एकध्रुवीय दुनिया से बहुध्रुवीय व्यवस्था में बदलाव कर देंगे। इस व्यवस्था में यूरेशियाई व्यापार गलियारे और स्थानीय मुद्राएं अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को चुनौती मिलेगी।



भारत के लिए अमेरिका कितना जरूरी?लेकिन अमेरिका अभी भी अपूरणीय है। आर्थिक रूप से, अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। बैंक ऑफ बड़ौदा के अनुसार, अमेरिकी उपभोक्ताओं ने साल 2024 में 77.5 अरब डॉलर के भारतीय सामान खरीदे।



संयुक्त राज्य व्यापार प्रतिनिधि (USTR) के आंकड़ों से पता चलता है कि साल 2024 में वस्तुओं और सेवाओं में कुल अमेरिकी-भारतीय व्यापार अनुमानित 212.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो साल 2023 से 8.3 प्रतिशत (16.3 बिलियन डॉलर) अधिक है।



भारत के लिए तिकड़ी कितनी सही?भारत के लिए रूस और चीन के साथ आना फायदे और नुकसान, दोनों का सौदा है। यह अमेरिका के दबाव के खिलाफ एक मंच प्रदान करता है, लेकिन इसके साथ कई खतरे भी जुड़े हैं। चीन के साथ भरोसे की कमी और पाकिस्तान से जुड़ी सुरक्षा चिंताएं इसे मुश्किल बनाती हैं। अमेरिका पर भारत की निर्भरता भी एक बड़ी वजह है।

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